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जातिगत द्वेश में जकड़ी है राष्ट्रवादी राजनीति की पाठशाला

- एक बेहतर व्यक्तित्व को संघर्षों से निकालकर बिहार की राजनीति को देना पड़ेगा

भारत में हिन्दुओं को बंटकर कटने के कगार पर ला दिया, वहीं बिहार में जातिगत राजनैतिक द्वेश ने बिहार को बर्बादी की कगार पर ला दिया

बिहार, नाम सुनते ही मन-मस्तिष्क में एक पिछड़ा सा प्रदेश की छवि कौंधने लगती है, लेकिन क्या बिहार पिछड़ा प्रदेश है या उसे वहां की राजनीति ने पिछड़ा बनाकर बीमारू की श्रेणी में खड़ा कर देता है। क्या बिहार राज्य हमेशा से ही ऐसा ही था, नहीं बिहार भारतीय इतिहास में सबसे समृद्धशाली राज्यों की श्रेणी में हुआ करता था। जो धर्म, आध्यात्म और राष्ट्रवादी राजनीति की परिपाटी गढ़ने वाला पाठशाला माना जाता था। इस विशेषण को प्रतिस्थापित करने के लिए बस दो नाम ही काफी है नालंदा विश्वविद्यालय और आचार्य चाणक्य, और इस क्षेत्र को बर्बाद करने के लिए इस्लामिक आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने यहां क्रूरता की सारी हदें पार कर दी। ये वहीं बिहार की भूमि है जिसने प्राचीन ही नहीं स्वतंत्र भारत में कई राजनैतिक हस्तियों को परिष्कृत किया, लेकिन कुछ अनैतिक राजनीतिज्ञों ने अपनी घृणित महत्वाकांक्षा के लिए बिहार को बिमार बना कर रख दिया।

बिहार में एक कालखंड ऐसा भी था इस राज्य में राजनीति का काला अध्याय लिखा गया जिसे हम जंगल राज के नाम से जानते हैं, जब बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लालू प्रसाद यादव बैठते थे। इस दौरान में अपराध एक व्यापार सरीखा था, जिसे पूर्ण रूपेण सत्ता का संरक्षण प्राप्त था।

एक घटना का जिक्र करना यहाँ आवश्यक है जब बिहार में तैनात एक आईएएस अधिकारी की पत्नी के साथ सत्ताधीशों के निकट संबंधी बलात्कार करते रहे और शीर्ष नेतृत्व अपराध को संरक्षण देता रहा।

एक वह भी घटना थी जब लालू यादव के बेटी की शादी में पटना के सभी कार शोरूम से नयी-नवेली गाडियां मंगा ली गयी और उन्हें कबाड़ बनाकर छोड़ दिया गया, ये वो दौर था जब बिहार में व्यापार चरमरा गया था और व्यापारी कराह रहे थे।

अब उसी जंगलराज के राजा की नई पौध वो राज लौटाने को तत्पर है, बिहार में पिछले दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने आरजेडी से गठबंधन किया था और कुछ ही दिनों में बिहार की जंगली राज तंत्र जागृत हो उठा था जिसके बाद नीतीश कुमार को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह वापिस भाजपा से अपना गठबंधन कर लिया।

 

बिहार राजनीति में जातिगत अभिशाप

बिहार की राजनीति में कई ऐसे विषयवस्तु है जो इस राज्य के लिए अभिषाप से कम नहीं है, इसमें सबसे बड़ा तत्व है जातिवाद, बिहार में जातिवाद की राजनीति पूरे भारत के किसी भी प्रदेश से सबसे ज्यादा कही जा सकती है। यहीं कारण है कि बिहार में एक परिवार ही सत्ता पर काबिज रहा। जिस प्रकार जातिवाद ने भारत में हिन्दुओं को बंटकर कटने के कगार पर ला दिया, वहीं बिहार में जातिगत राजनैतिक द्वेश ने बिहार को बर्बादी की कगार पर ला दिया था। फिलहाल बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व की सरकार ने राज्य को संभाला है, लेकिन राजनैतिक खींचतान, गठजोड़ की राजनीति ने बिहार में अस्थिरता बनायी हुई है। इसी का परिणाम है कि बिहार कई दृष्टिकोड़ से समृद्धशाली होने के बाद भी विकास की दौड़ में शामिल नहीं है, और यहां से लोगों पलायन कर दूसरे राज्यों में शरण लेनी पड़ रही है।

यदि बिहार की जनता जातिगत मतभेद की मानसिकता से खुद को दूर रखकर अपने प्रदेश के उत्थान और विकास को दृष्टिगत रखें तो बिहार की सूरत बेहतर हो सकती है। वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार काफी हद तक विकास की राह पकड़े हुए है लेकिन नीतीश के कंधों पर अब बिहार का बोझ संभाल पाना कठिन जान पड़ता है। ऐसे में एनडीए को एक बेहतर व्यक्तित्व को संघर्षों से निकालकर बिहार की राजनीति को देना पड़ेगा।

 

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